कबीर के दोहे वीरता पर अर्थ सहित | kabir ke Dohe virta per with meaning


Mahatma kabirdas ek Bade Gyani Sant aur Tatvgyani Bhi The.Kabirdasji Ne Apna Gyan likha hai jo ke "Kabir ke dohe" (कबीर के दोहे)kahlate hai aur kabirdasjine bhajan bhi likhe hai ke jo "kabir ki amritvani"(कबीर की अमृतवाणी) kahlate hai.kabir das ji.

Manav jivan har pahelu per kuch na kuch Likha Jese ke .Dharm(धर्म) Per jo Dohe Likhe hai wo kabir ke dharm per (कबीर के दोहे धर्म पर)dohe.Eaise hi Kabir ke "prem per dohe".ityadi hai jo apko yaha hum prastut kar Rahe Hai .

Asha Hai apko Pasand ayenge
Apko Hamara ye chota sa prayas "kabir ke Dohe "kaisa Laga Hume Comments Karke Jarur batayega.


kabir ke Dohe virta per with meaning


   |  "kabir ke Dohe" virta per with  |          

                      | meaning |



1) कबीर के दोहे वीरता पर


सिर राखे सिर जात है, सिर कटाये सिर होये
जैसे बाती दीप की कटि उजियारा होये।
"अर्थ" : सिर अंहकार का प्रतीक है। सिर बचाने से सिर चला जाता है-परमात्मा दूर हो जाता हैं।
सिर कटाने से सिर हो जाता है। प्रभु मिल जाते हैं जैसे दीपक की बत्ती का सिर काटने से प्रकाश बढ़ जाता है।

2) कबीर के दोहे वीरता पर


साधु सब ही सूरमा, अपनी अपनी ठौर
जिन ये पांचो चुरीया, सो माथे का मौर।
"अर्थ" : सभी संत वीर हैं-अपनी-अपनी जगह में वे श्रेष्ठ हैं। जिन्होंने काम,क्रोध,लोभ,मोह
एंव भय को जीत लिया है वे संतों में सचमुच महान हैं।

3)कबीर के दोहे वीरता पर


सूरा के मैदान मे, कायर का क्या काम
सूरा सो सूरा मिलै तब पूरा संग्राम।
"अर्थ" : वीरों के युद्ध क्षेत्र में कायरों का क्या काम। जब वीर का मिलन होता है तो संग्राम पूरा होता है।
जब एक साधक को ज्ञानी गुरु मिलते हैं तभी पूर्ण विजय मिलती है।

4)कबीर के दोहे वीरता पर


सिर राखे सिर जात है, सिर कटाये सिर होये
जैसे बाती दीप की कटि उजियारा होये।
"अर्थ" : सिर अंहकार का प्रतीक है। सिर बचाने से सिर चला जाता है-परमात्मा दूर हो जाता हैं।
सिर कटाने से सिर हो जाता है। प्रभु मिल जाते हैं जैसे दीपक की बत्ती का सिर काटने से प्रकाश बढ़ जाता है।

5)कबीर के दोहे वीरता पर


साधु सब ही सूरमा, अपनी अपनी ठौर
जिन ये पांचो चुरीया, सो माथे का मौर।
"अर्थ": सभी संत वीर हैं-अपनी-अपनी जगह में वे श्रेष्ठ हैं। जिन्होंने काम,क्रोध,लोभ,मोह
एंव भय को जीत लिया है वे संतों में सचमुच महान हैं।

6) कबीर के दोहे वीरता पर


सूरा के मैदान मे, कायर का क्या काम
सूरा सो सूरा मिलै तब पूरा संग्राम।
"अर्थ" : वीरों के युद्ध क्षेत्र में कायरों का क्या काम। जब वीर का मिलन होता है तो संग्राम पूरा होता है।
जब एक साधक को ज्ञानी गुरु मिलते हैं तभी पूर्ण विजय मिलती है।

7) कबीर के दोहे वीरता पर


आगि आंच सहना सुगम, सुगम खडग की धार
नेह निबाहन ऐक रस महा कठिन ब्यवहार।
"अर्थ" : आग की लपट सहना और तलवार की धार की मार सहना सरल है किंतु प्रेम रस का निर्वाह अत्यंत कठिन व्यवहार है।

8) कबीर के दोहे वीरता पर


सूरा सोई जानिये, लड़ा पांच के संग
राम नाम राता रहै, चढ़ै सबाया रंग।
"अर्थ" : सूरवीर उसे जानो जो पाॅंच बिषय-विकारों के साथ लड़ता है।
वह सर्वदा राम के नाम में निमग्न रहता है और प्रभु की भक्ति में पूरी तरह रंग गया है।

9) कबीर के दोहे वीरता पर


आप स्वार्थी मेदनी, भक्ति स्वार्थी दास
कबिरा नाम स्वार्थी, डारी तन की आस।
"अर्थ ": पृथ्वी जल के लिये इच्छा-स्वार्थ कड़ती है और भक्ति प्रभु के लिये आत्म समर्पण चाहती है।
कबीर शरीर के लिये समस्त आशाओं को त्याग कर प्रभु नामक सूमिरण हेतु इच्छा रखते हैं।

10) कबीर के दोहे वीरता पर


उॅंचा तरुवर गगन फल, पंछी मुआ झूर
बहुत सयाने पचि गये, फल निरमल पैय दूर।
"अर्थ ": वृक्ष बहुत उॅंचा है और फल आसमान में लगा है-पक्षी बिना खाये मर गई।
अनेक समझदार और चतुर व्यक्ति भी उस निर्मल पवित्र फल को खाये बिना मर गये।
प्रभु की भक्ति कठिन साधना के बिना संभव नहीं है।

11) कबीर के दोहे वीरता पर


हरि का गुन अति कठिन है, उॅंचा बहुत अकथ्थ
सिर काटि पगतर धरै, तब जा पंहुॅचैय हथ्थ।
"अर्थ" : प्रभु के गुण दुर्लभ,कठिन,अवर्णनीय और अनंत हैं।
जो सम्पूर्ण आत्म त्याग कर प्रभु के पैर पर समर्पण करेगा वही प्रभु के निकट जाकर उनके गुणों को समझ सकता है।

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